Monday, 11 May 2009

शब्दों के भाव

शब्द तो शब्द हैं ,तुम्हे शब्दों में पिरोती हूँ
कि तुम मेरी कृति बन जाओ
भावों के धरातल पर नवीन पुष्प संजोती हूँ
कि तुम नित खिलो
मेरे नयनो में समाओ

चंचल भावों का सुरम्य गृह मेरा मन
तुम्हारी साँसों के स्पंदन से डोले
बस छूलो मुझे आंखों से यूँ
कि तुम्हारा स्पर्श मेरी आत्मा को छू ले

मन तुम्हे शब्दों में खोजता है
कि शब्द तो बस मेरे हैं
मेरे होंठों को छूकर तुम्हारे दिल में बसेंगे
जो तार मेरे ह्रदय के ,तुम्हारे ह्रदय से जुड़ते हैं
उस बंधन की अनुभूति को अभिभूत करेंगे

प्रेम कि यह धारा ह्रदय में ऐसे बहे
कि तुम्हारी पीड़ा तुम्हारी ना रहे
उदगार मेरे प्रेम का कुछ ऐसे हो
की तुम्हारी आंखों का नीर मेरी आंखों से बहे

नित नवीन शब्दों में तब तक तुम्हे खोजती रहूंगी
जब तक यह शब्द सुन्दरतम की सीमा तक पहुंचें
शब्दों का संगम हो बने ऐसा निर्झर
जिसकी बूँदें विनय हो
और धारा शीतल

4 comments:

  1. प्रिय बहन
    जय हिंद
    हिंदी साहित्य को समृध्द करने की दिशा में आपके द्वारा यह कारगर प्रयास है
    ब्लॉग जगत में अपनी आमद दर्ज कराने का शुक्रिया सीधी चोट प्रभावशाली लगी
    अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें

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  2. Kya baat hai.. Bahut hi khoob..
    Itni pyaari rachna kaise pahle padhne se chook ho gayi hamse..
    Bahut badhaai aapko..

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  3. bahut hi sundar aur pyaari si rachana ..

    man ke bhaavo ki sahi abhivyakti ...

    itni acchi rachna ke liye badhai ..............

    meri nayi poem padhiyenga ...
    http://poemsofvijay.blogspot.com

    Regards,

    Vijay

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